Sunday, November 19, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-49

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  19.11.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल उमेश महादोषी की क्षणिका।


उमेश महादोषी




01.

पत्थर देता है
पत्थर का जवाब
जंग के मैदान में
दूब हरियाती है
मेरी आँख है, कि
बार-बार धोखा खाती है!

02.

जब तुम
तय करती हो एक रास्ता...
जब तुम 
चलती हो तेज कदमों से...
अच्छा लगता है
तुम्हारे पीछे चलना...

तुम... ऐसे ही...

03.

जितना
पढ़ लेता हूँ 
जीवन का पाठ
नशे में
उतना ही
कौंध जाता हूँ
बादलों के बीच!

04.

शराब तो
मैं भी पीता हूँ
जानने के लिए-
रेखाचित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
कितनी कड़वाहट घोली गयी है
जीवन की तरलता में!

05.

जिसे सुनना नहीं
वह कहानी
किसने गढ़ी है...?
बात सिर्फ इतनी नहीं है
कि द्रोपदी
चौराहे पर खड़ी है!

06.

 जो देखा गया है
कालचक्र की परिधि से 
बाहर खड़े होकर
संभव नहीं है-
याद रख पाना
या सहेज पाना!
  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004 

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-48

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  19.11.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री मंजू मिश्रा जी की क्षणिका।


मंजू मिश्रा





01.

चाँदनी,
तारों के बटन लिए हाथ में,
ढूँढती रही  रात भर ...
कुरता,
चाँद की नाप का

02.

यूँ भी हो कभी 
कुछ तुम कहो न हम 
रेखाचित्र : संदीप राशिनकर 

बस मौन बोले 
और मन...
बरसों के जंग लगे 
ताले खोले 

03.

मोती होने को 
ढूँढती रही बूँद-
गोद सीप की  
और नक्षत्र स्वाति का

  •  ईमेल : manjumishra@gmail.com

Sunday, November 12, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-47

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  12.11.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल श्री जयसिंह अलवरी जी की क्षणिकाएँ।


जयसिंह अलवरी







01.

लिखने बैठा 
जब-जब मैं 
आज के हालात पे कहानी
निकला सस्ता खून
महँगा पानी।

02.


बात-बात पे
होते अब
बड़े-बड़े दंगे हैं
छायाचित्र : उमेश महादोषी 
कहते जिन्हें

सब भोले हैं
वे भी हाथ
रँगे हैं।



  • दिल्ली स्वीट, सिरुगुप्पा-583121, जिला बल्लारी (कर्नाटक)/मोबा. 09886536450

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-46

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  12.11.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री सीमा स्मृति जी की क्षणिका।


सीमा स्मृति




01.

कुदरत लिखती रही
हर दिन
जिन्दगी की किताब के पन्ने
हम किताबों में 
खोजते रहे ज़िन्दगी।

02.

मत किया करो
वक़्त से कोई सवाल
उत्तर के इंतज़ार में/अक्सर 
जिन्दगी की लय बिगड़ जाती है।

03.

एक सत्य 
बेल से लिपटे सर्प-सा
मन की देहरी पे
सरसराने लगा
लम्बी खामोशी में
रेखाचित्र : डॉ. सुरेंद्र वर्मा 
गूँजती रही फुँकार
कुछ सर्प-
बिल नहीं खोजा करते।

04.

जीया दर्द
खोजती रही खिड़कियाँ
क्यों रही अनजान
दरवाजे की अहमियत से!
  • जी -11 विवेक अपार्टमेंट श्रेष्ठ  विहार, दिल्ली-110092/मो. 09818232000

Sunday, November 5, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-45

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  05.11.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल डॉ. सुरेश सपन जी की क्षणिकाएँ।


सुरेश सपन




01.
सदी का 
बदलता है मानचित्र
हम देखते हैं
बढ़ती हुई
दीवार से दीवार की दूरी
और मुँडेरों पर 
उगती हुई काँच की किरचें!

छायाचित्र : उमेश महादोषी
02.
कहीं हवा बनायी जाती है
और कहीं बिगाड़ी जाती हैं
जो इस खेल में कहीं नहीं हैं
उनकी जान जाती है!

03.
कल का गाँव/आज का गाँव
बदला बस इतना सा है 
धूप ही धूप बची 
ढूँढने पर भी नहीं मिलती छाँव
  • डॉ. सुरेश चन्द्र पाण्डेय, विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनु. संस्थान, अल्मोड़ा(उ.खंड.)/मो.09997896250

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-44

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                  अप्रैल 2017



रविवार  :  05.11.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल श्री शशांक मिश्र भारती जी की क्षणिकाएँ।


शशांक मिश्र भारती




01.
स्वाद उनका-हाथ उनका
चाकू उनका-
कटा मैं...
फल बेचारा!

02.
सूर्य न/बन सके तुम,
क्या जल भी न सकते थे
लघु दीप बन। 

03.
जब-जब
रामगुप्त इस धरा पर
रेखाचित्र : डॉ. सुरेंद्र वर्मा  
शासन है करता
ध्रुवस्वामिनी अपमानित
आम-आदमी रोटी को तरसता।

04.
झाड़-झाड़ कर
अपने घर को
पटक ला दिया/एक किनारे
झाड़न या...। 
  • हिन्दी सदन, बड़ागांव, शाहजहांपुर-242401, उ.प्र./मो. 09410985048

Sunday, October 29, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-43

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  29.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री उषा कालिया जी की क्षणिका।




उषा कालिया






01.
हृदय के प्रांगण में 
गाँव की तस्वीर बसी थी
बरसों बाद देखा 
सब कुछ बदल गया है
नैसर्गिक सुन्दरता को 
भौतिकता के 
विषैले आवरण ने ढक लिया है।

02.
रेखाचित्र : बी. मोहन नेगी 
सृष्टि के रचयिता
तुम्हारी हर रचना
मन्त्रमुग्ध करती है
उदासी के पलों में
प्रकृति सहचरी बन
आशा के रंग भरती है


  • घुग्गर नाले, चाणक्यपुरी, पालमपुर-176061, जिला कागड़ा, हि. प्र./मो. 09418833589 

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-42

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  29.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री अनिता मण्डा जी की क्षणिकाएँ। 



अनिता मण्डा





01.
नदियों ने बड़ा धोखा दिया
रख लिए मेरे सारे सिक्के,
जो आँखें बंद कर
मन में मुराद माँग
फेंके थे मैंने!!

02.
नदी का सूखना अपशकुन है,
रेखाचित्र : बी. मोहन नेगी    
धर्म, शकुन, अपशकुन
कुछ मत मानो चाहे
पर इतिहास गवाह है
जब-जब सूखी हैं नदियाँ
समा गई भूमि में
कई सभ्यताएँ!!

03.
वो सितारे 
खुद ही टूट रहे थे
वो मेरी मन्नत कहाँ से 
पूरी करते!!


  • आई-137, द्वितीय तल, कीर्ति नगर, दिल्ली-110015/फोन 08285851482

Sunday, October 22, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-41

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  22.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल श्री सुनील गज्जाणी जी की क्षणिका।


सुनील गज्जाणी




01.
मखमली सुबह
ठिठुर रही है
कोहरे में लिपटी
सूरज खड़ा
मुस्कुरा रहा
चाँद की मानिंद!

02.
...बच्चो जैसी
लग रही थी
शाखाओं पर खिलती कोपलें

छायाचित्र : उमेश महादोषी 
और स्वर्णिम पत्तियाँ
मानो बुजुर्ग!

03.
मृत्यु, कितना लंबा 
धैर्य रखती है
ज़िंदगी के प्रति 
उसका सिर्फ एक क्षण 
लेने की खातिर!



  • सुथारों की बड़ी गुवाड़, बीकानेर-334005, राज./मो. 09950215557 

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-40

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  22.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री कमलेश सूद जी की क्षणिका।


कमलेश सूद



01. 
सुनामी 
जिन्दा है आज भी
उन आँखों में
देखे हैं मंजर मिटते जिन्होंने
बहते रिश्तों के!

02. 
बिटिया तुम्हारी हँसी से
खिल-खिल उठता है आँगन मेरा
बजती है झाँझर तेरी
नाच उठता है मन-मयूरा!

03.
वृद्धाश्रमों में बढ़ती संख्या

बेरौनक, पत्थर से चेहरे
खाली रास्तों को ताकती
छाया चित्र : बलराम अग्रवाल 

सपाट नज़रें
बयान कर रही हैं-
घर-घर की कहानी!

04.
बुरे समय को पहचान अब
कुत्ते-बिल्लियाँ भी
एक हो गये हैं
आदमी ही नहीं समझता
यह बात और है!


  •  वार्ड नं. 3, घुघर रोड, पालमपुर-176061 (हि.प्र.)/मोबा. 09418835456

Sunday, October 15, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-39

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  15.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री कमलेश चौरसिया जी की क्षणिका।




कमलेश चौरसिया





01.

सफेदपोश
उजले कपड़े पहन
बैठे
झक-सफेद कुर्सी पर
बैठते ही 
कुर्सी काली हो गई।

02.

माँ गंगा
छायाचित्र : उमेश महादोषी 
सिर के
सारे टोने-टोटके
बहा देती
आँचल से!

03.

इश्क के दरिया में
छपछपाना है, तैरना है, डूबना है
शिद्दत से हाथ थाम लो
पार उतर जाना है।
  •  गिरीश-201, डब्ल्यू.एच.सी. रोड, धरमपेठ, नागपुर-440010, महाराष्ट्र/मो. 08796077001

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-38

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  15.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल श्री कुमार आनन्द पाण्डे जी की क्षणिका।





कुमार आनन्द पाण्डे






01.

कंकरीट के जंगल
खा रहे खेत-खलिहान
रोटी की चाह में
गाँव दौड़ रहे शहरों की ओर
छायाचित्र : उमेश महादोषी 
अब रोटी बोयेगा कौन?

02.

अँधेरी रात है
चाँदनी डरती है
निकलने से 
कंकरीट के इस जंगल में
जाने कब कौन
जानवर मिल जाये!

  • 179/ए, इन्द्रापुरम्, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09456280544

Sunday, October 8, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-37

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  08.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल सुश्री सपना मांगलिक जी की क्षणिका।


सपना मांगलिक




01.
काव्य सृजन
यानि ठंडे रिश्ते
जहन में अगन
कवि मायूस/और 
टुकड़ों में विभक्त/उसका मन।

02.
मन-मस्तिक/निरंतर द्वंद
हो न हो, जरूर
है इनमें भी कुछ
घनिष्ठ सम्बन्ध।

03.
जिन्दगी और मौत
रेखाचित्र : स्व. पारस दासोत 
खेल रही हैं शतरंज
लगाए बैठी हैं घात
विरोधी को दें कब पटखनी
करके शय और मात

04.
चींटी से हो शुरू
हाथी बन जाती है
छोटी सी एक बात
बातों-बातों में
बे-बात बढ़ जाती है।


  •  एफ -659, कमला नगर आगरा-282005, उ.प्र./मो. 09548509508

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-36

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  08.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल श्री राम प्रवेश रजक जी की क्षणिका।


राम प्रवेश रजक

01. अगर

डॉक्टर बनती
अगर
मैं
पैदा होती!

02. अफसर बिटिया

देश कैसे सुधरेगा
हजारों की संख्या में
रोज मर रही हैं
‘अफसर बिटिया’।

03. किसान की जान

चिलचिलाती धूप में
नौरंगित्रा की सूख जाती है
रेखाचित्र : उमेश महादोषी 
‘प्राण’
जैसे... जैसे सूखती है
असमय धान की मोरी।

04. सवाल

नजरुल, निराला, दिनकर की
कविताएँ
सरकार से पूछती हैं-
सैकड़ों सवाल
अक्सर!

  •  हिन्दी विभाग, पाण्डेश्वर कॉलेज, पाण्डेश्वर-713346, जिला वर्द्धमान, प. बं./मो. 09800936139

Sunday, October 1, 2017

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-35

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  01.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल डॉ.  रमा द्विवेदी जी की क्षणिका। 



रमा द्विवेदी 




01. 
रेखाओं की संवेदना को,
कठोर न बनने दें,
नहीं तो,
मनुष्यता नष्ट हो जाएगी।

02.
रेखाएँ!
सीधी, आड़ी, तिरछी,
खींचकर देखिए,
कभी-कभी,
कुछ महत्वपूर्ण बन जाता है।

03.
रेखाएँ,
नदी के दो किनारे जैसी हों
और रिश्तों के बीच बहती रहें
मिठास, स्नेह और
आत्मीयता।

04. मैं बूँद हूँ        
मैं बूँद हूँ तो क्या 
लेकिन मैं 
खुद को आजमाने का 
हौसला रखती हूँ 
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
इसलिए तो
विशाल समंदर से 
खुद ही मिलती हूँ।

05. अलगाव
रिश्तों में
भौतिक रूप से 
अलगाव हो सकता है, पर           
दिल में कोमल भाव 
फूलों-सा महकते भी हैं 
और त्रासद पल
नासूर की तरह 
दहकते भी हैं...

  • फ़्लैट नं.102, इम्पीरिअल मनोर अपार्टमेंट, बेगमपेट, हैदराबाद-500016, आं. प्र. 

खण्ड-2 के क्षणिकाकार-34

समकालीन क्षणिका             खण्ड/अंक-02                   अप्रैल 2017



रविवार  :  01.10.2017

क्षणिका की लघु पत्रिका ‘समकालीन क्षणिका’ के अप्रैल 2017 में प्रकाशित खण्ड-2 में शामिल श्री ललित कुमार मिश्र ‘सोनीललित’ जी की क्षणिका।


ललित कुमार मिश्र ‘सोनीललित’




01. व्यवस्था
मल निकासी को 
सीवर और नालियाँ
और अन्तर्मल हेतु 
अनगिनत बस्तियाँ

02. चरित्र
चरित्र केवल
स्त्रियों का होता है
इसलिए
चरित्रहीन भी
स्त्रियाँ ही होती हैं

03. चक्रव्यूह
तुम देह का चक्रव्यूह 
छाया चित्र :  उमेश महादोषी
रचती रही ताउम्र
अब शिकायत है कि 
कोई तुम तक नहीं पहुँचा

04. अहिल्या
अहिल्याएँ
आज भी
अपने भीतर के
पौरुष को
जगाने की बजाय
राम का इंतज़ार करना
बेहतर समझती हैं।

05. सफर
तुम खुद ही बँध गए थे 
मंज़िलों में
वरना सफर तो 
उसके आगे भी बहुत था
  • 78 ए, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार, नजफगढ़, नई दिल्ली-43/मो. 09868429241