Sunday, February 18, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका            ब्लॉग अंक-03 / 13                     फ़रवरी 2018


रविवार  :  18.02.2018 


‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा। 
सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!


सुनील गज्जाणी




01.

तुम मेरा बजूद हो
मगर 
मैं तुमसे नहीं
भिन्न-भिन्न
अस्तित्व लिए 
तुम एक अहसास हो
जो गुजरता है
मुझसे होकर!


02.

मैं, जन्मा ही नहीं
छायाचित्र : डॉ. बलराम अग्रवाल 

तुममें
हैरत में हो?
क्या जन्मना गर्भ से ही होता है?
तुम्हारे हृदय से भी तो
जन्म सकता था मैं
प्रेम के रूप में
जो संभव नहीं हो पाया!

  • सुथारों की बड़ी गुबाड़, बीकनेर-334005, राज./मो. 09950215557

Sunday, February 11, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 12                         फ़रवरी 2018



रविवार  :  11.02.2018 


‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा। 

सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!


पुष्पा मेहरा 




01.

रात हुई, अँधेरा छाने लगा 
अमावस सारी ही रात 
तारों की रौशनी में 
जीवन-पल गिनती रही।

02.

आई थी झंझा 
काँपी थी लता,
अवलम्बन पा पेड़ का 
वह जी गई। 

03.

वह ताबूत नहीं 
किसी की ममता, दो आँखें 
प्यार और- और क्या ?
किसी जुझारू का देश प्रेम है। 

04.

मन एक सड़क 
असंख्य गड्ढों से भरा,
समा जाता जो इसमें 
लौट के नहीं आता 
शायद कोई ब्लैक होल है !! 

05. 

बसंत ने कहा- 
रेखाचित्र : (स्व.) बी. मोहन नेगी 
मैं फ़िर लौटूँगा 
तुम सारे द्वार
खुले रखना।

06.

भोर होगी 
उड़ आएँगीं तितलियाँ वही 
रात भर जिन्हें 
सपनों ने जगाया था !!
  • बी-201, सूरजमल विहार, दिल्ली-92/फ़ोन 011-22166598

Sunday, February 4, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 11                          फ़रवरी 2018



रविवार  :  04.02.2018 


‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा। 

सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!



सीमा स्मृति 







01. याद 

याद कोई बादल नहीं, 
जो आये और चली जाए 
ये तो वो
थिर सूरज हैं 
जो चमकता क्षण प्रति क्षण 

02. ‘मूक’

स्पर्श केवल, अंधकार की जबान नहीं, 
यह भाषा है, 
प्रत्येक जीवन की
भट्टी के अंगारो की तरह उकेरा है 
हर स्पर्श से पूर्व ‘जिन्दगी’ ने।

03.

खामोश हो गई, हवा
इस डर से
आदतें भी अजीब हुआ करती हैं
साँस लेने को
ज़िन्देगी समझने की आदत।

04.

सागर से पूछा
रेखाचित्र : राजेंद्र परदेसी 

कैसे हज़ारो राज
अपने तहों में छिपाये रहते हो
सागर मुस्कराया और बोला
मैं इंसान नहीं
जो अनभिज्ञ रहे
अपने ही मन की थाह से।

05.

तलाशती रही ज़िन्दगी-साथ
उनके भी साथ, जो 
चलते रहे साथ-साथ।

  • जी-11, विवेक अपार्टमेंट, श्रेष्ठ विहार, दिल्ली -110092/मो. 09818232000

Sunday, January 28, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 09-10                  जनवरी 2018



रविवार  :  28.01.2018 


‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा। 

सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!



गोवर्धन यादव





01. 

सड़कों पर परिरंभन हो, 
चौराहों पर चीरहरण
शैशव के तेरे ये दिन है, 
तो भरी जवानी में क्या होगा

02. 

दिन भर का थका हारा सूरज
देर तक सुस्ताता रहा 
और बुनता रहा किरणों का जाल
मैं मृत्तिका के दीप सा जलता रहा रात भर
तो, 
जल जाना ही मेरा काम है
आलोक मेरा नाम है, 

  • 103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा-480001. म.प्र./मो. 09424356400   





राजेन्द्र यादव






01.   मदहोश 

इतना दर्द पिलाया साकी,
आखिर वह 
मदहोश हो गई
सदा बोलने से शिकवा था,
आज सदा 
खामोश हो गई

02. खातिर

सूरज की मानिंद
ये जीवन,
शाम ढले ही
अस्त!

  • श्रद्धा नगर, छिंदवाड़ा-480001 (म.प्र)/मो. 09425360938

Sunday, January 21, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 08                      जनवरी 2018



रविवार  :  21.01.2018 


‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा। 

सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!



अंजु दुआ जैमिनी






01.
रखा था चूंकि
पैर पूँछ पर
भाया न था
उसका आशय
निकाल फेंका
बलात्कारी ने
उसका गर्भाशय!

02. श्राप

अकेलेपन को श्राप मान
कब तक जीते रहोगे
नीड़ छोड़ उड़ गया जो
निश्चित ही लौटकर
नहीं आएगा
पर इतना तय है
कि अपने बनाए नीड़ में

इक दिन वह भी
तन्हा रह जाएगा!

03. दूर बहुत
मुट्ठी में तेरी
छायाचित्र : डॉ. बलराम अग्रवाल 
मैं सोनचिरैया
उड़ने न देता
प्रेम जताता,
कभी-कभार
खोलता मुट्ठी
भींच लेता फिर चटाचट
इस कदर है सताता

  • 839, सेक्टर-21सी, फरीदाबाद, हरियाणा/ मो. 09810236253

Sunday, January 14, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 07                     जनवरी 2018



रविवार  :  14.01.2018 

‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।



ज्योत्स्ना शर्मा 





01. अक्स !

यूँ छुप तो जाते हैं
दिल के छाले
जतन से ...
छुपाने से
कैसे रोक पाऊँ मैं
अक्स..
रूह के ज़ख़्मों के
लफ़्ज़ों में उभर आने से !!

02. उम्मीद!

कतरे पंख
और... लग गए खुद ही
मर्सिया गाने में
ठहरो!
ज़िन्दा हूँ अभी
भरूँगी उड़ान...
कुछ वक़्त तो लगेगा
नए पंख आने में !!

03. तेरी याद!

एक बदली है
दिल के सहरा को
इस तरह...
पल-पल परसती है
जिस तरह ...
भरके माँग तारों से,
रात की दुलहिन
रात भर तरसती है !!!

04. तितली



कैसे मन को
सुकूँ ..
कैसे तन को
आराम!
नर्म ,नाज़ुक
मखमल बदन
छायाचित्र : उमेश महादोषी 
और...
फूलों में, शूलों में
विचरने का काम...
मेरे खुदा!
तू ही बता
क्या होना अंजाम?

05. 

बड़ी गहरी...
चुभी थी कोई फाँस...
करकती रही!
और ज़िंदगी...
अपने वजूद का अहसास लिए
धीरे-धीरे...
सरकती रही!


  • एच-604, छरवाडा रोड, वापी, जिला-वलसाड-396191, गुजरात/मो. 09824321053

Sunday, January 7, 2018

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 06                    जनवरी 2018 



रविवार  :  07.01.2018 

‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।




बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’ 




01. पेट 
रोटी के पीछे भागता मजदूर 
हारेगा ज़रूर 
दूर 
ढोल बज रहा।

02. क़र्ज 

साहूकार ने बो दिए नोट 
किसान के पेट में 
खेत ने मुँह मोड़ लिये 
तिजोरी की तरफ़।

03. विरोधाभास 

शहर 
पिकनिक मनाने 
रेखाचित्र : डॉ. सुरेंद्र वर्मा 
जाते जंगल 
जंगल मरता 
जंगल 
पिकनिक मनाने 
आते शहर 
शहर साँस लेता।

04. ताक़त 

कुर्सी के चारों पैरों के बीच 
बैठा बब्बर शेर 
कहना मानने मजबूर।
  • डॉ. बख्शी मार्ग, खैरागढ़-491881, जिला राजनांदगांव, छ.गढ़/मो.09424111454

Sunday, December 31, 2017

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका              ब्लॉग अंक-03 / 05                   दिसम्बर  2017



रविवार  :  31.12.2017

‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।



वंदना गुप्ता





01.

मैने उम्र की गुल्लक में 
रोज एक दिन डाला
और जिस दिन तोडा 
रीता ही पाया ... 

जाने/मैंने पहेली को  बूझा 
या पहेली ने मुझे...

02. 

पदचाप ध्वन्यात्मक बनाने हेतु 
जो 
उतारा गया हो 
खाल का लिबास 
अब बूँद-बूँद रिसता रक्त 
गवाह है उसकी मजबूरियों का

कितना छीला गया होगा रंदा मार मार

जाने किसकी ख्वाहिशों की प्रतिध्वनि है
छायाचित्र : उमेश महादोषी 
अब उसका वजूद!!!

03. 

नहीं उलीच पाती 
मन में ठहरे 
दर्द के समंदर को 
अंजुलि में भर-भर
बस खुद को
किनारे कर लेना भर 
सीखा मैंने

शोक संदेश 
अघोषित चुप्पियों को खोलने की 
चाबी नहीं हुआ करते .....
  • डी-19, राणा प्रताप रोड, आदर्श नगर, दिल्ली-110033 / मो. 09868077896

Sunday, December 24, 2017

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका             ब्लॉग अंक-03 / 04                    दिसम्बर  2017



रविवार  :  24.12.2017

‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।


केशव शरण



01. एक दिन

एक दिन
प्रकृति मर जायेगी
रोयेगा ईश्वर
उसके बिन
तन्हा

02. मैं और तुम

मैं नहीं जानता
तुम्हारा पता
तुम कहाँ हो
लेकिन मैं हूँ यहाँ
अकेलेपन के नर्क में।

03. जीवन नया

आनंदपूर्ण भोगवाद गया
रेखाचित्र :
कमलेश चौरसिया 
अब जीवन नया

04. आकाश

आकाश दूर तक फैला है
लेकिन मैला है

05. धन्यता

सौ में
दो ने सुनी
कू-कू

धन्य हुई कोयल
  • एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी-221002, उ.प्र./मो. 09415295137

Sunday, December 17, 2017

क्षणिका चयन-01 : मुद्रित अंक 01 व 02 के बाद

समकालीन क्षणिका             ब्लॉग अंक-03 / 03                    दिसम्बर  2017



रविवार  :  17.12.2017

‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।


मंजूषा मन



01.

दीवार पर टँगे 
कलेण्डर से हो गए हैं 
लोग,

गहरे दबा छुपा लेते हैं
इस्त्री किये चेहरे के पीछे
दर्द की रेखाएँ।

02.

आसान नहीं 
देख पाना
चेहरे के पीछे का चेहरा

और उस पर
कुछ लोगों के
कई-कई चेहरे हैं।

03.

कुछ ज़ख्मों का
न भरना ही अच्छा...

अपनी भूलों का 
एहसास 
बना रहता है।

04.
दुःख की सांकल
दर्द की बेड़ियाँ,
बाँधे मन 
जकड़े तन
टूटे न किसी सूरत
मन में बसी मूरत।
रेखाचित्र :
बी. मोहन नेगी
 

05.

सरल था कहना
उससे भी सरल था
सुन लेना...

पर... 
कठिन था
समझ पाना
और 
सहना सबसे कठिन...

  • द्वारा अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन, भाटापारा, ग्राम : रवान (Rawan)
जिला : बलौदा बाजार (Baloda Bazar)-493331, छत्तीसगढ़/मो. 09826812299