समकालीन क्षणिका ब्लॉग अंक-03 / 45 सितम्बर 2018
‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।
सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!
भावना कुँअर
01. दर्द
जब दर्द हद से गुजरता है ...
तो लोग कहते हैं ग़ज़ल होती है
वो क्या जाने ...
कि दर्द के दरिया में पड़े...
शब्द के सीने से
निकलने वाली चीत्कार
कितनी असहनीय होती है।
02. एक और दीपक
रोशन होता
एक और दीपक
इस दीपावली में
हवा का झोका
उड़ा ले गया संग
जाने क्यों बेख्याली में।
03. सिलवटें
चेहरे पर पड़ी सिलवटें
आज पूछ ही बैठी
उनसे दोस्ती का सबब
मैं कैसे कह दूँ कि
तुम मेरे
प्यार की निशानियाँ हो।
04. तोहफ़ा
गुनहगार हैं हम
जो ख़ुद को
बीमार पड़ने से न रोक पाए...
तभी तो तेरा
तिरस्कार और नफ़रत
तोहफ़े में ले चुप चले आए।
05. तस्वीर
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छायाचित्र : उमेश महादोषी |
लिपटी रहती थी यादें बनी
मेरी नन्ही निशानियाँ...
आज वहाँ किसी की
तस्वीर नज़र आती है।
06. उड़ान
उड़ान...
थककर चूर हो जाती
पर जरा न बैठ पाती
लगी रहती नाम सार्थक करने में
बस फिर...
उड़ती ही जाती...
- सिडनी, आस्ट्रेलिया
- भारत में : द्वारा श्री सी.बी.शर्मा, आदर्श कॉलोनी, एस.डी.डिग्री कॉलिज के सामने, मुज़फ़्फ़रनगर(उ.प्र.)/ईमेल : bhawnak2002@gmail.com