समकालीन क्षणिका ब्लॉग अंक-03/330 अप्रैल 2024
सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!
उमेश महादोषी
1.
आत्मा को उमेठती है
हवा
निचोड़कर पी जाती है
संस्कारों को
कब तक सहें हम
यह भयावह तपिश!
2.
![]() |
रेखाचित्र : कमलेश चौरसिया |
कुल्हड़ों में
ठंडाता मिला- सूरज
देखो,
दिल्ली का यह हाल है!
- 121, इंदिरापुरम, निकट बीडीए कॉलोनी, बदायूं रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004