समकालीन क्षणिका ब्लॉग अंक-03 / 60 फ़रवरी 2019
01. समकालीन क्षणिका विमर्श { क्षणिका विमर्श }
02. अविराम क्षणिका विमर्श { क्षणिका विमर्श }
रविवार : 24.02.2019
‘समकालीन क्षणिका’ के दोनों मुद्रित अंकों के बाद चयनित क्षणिकाएँ। भविष्य में प्रकाशित होने वाले अंक में क्षणिकाओं का चयन इन्हीं में से किया जायेगा।
सभी रचनाकार मित्रों से अनुरोध है कि क्षणिका सृजन के साथ अच्छी क्षणिकाओं और क्षणिका पर आलेखों का अध्ययन भी करें और स्वयं समझें कि आपकी क्षणिकाओं की प्रस्तुति हल्की तो नहीं जा रही है!
प्रशान्त उपाध्याय
01. बसन्त
जिन्दगी के पेड़ों पर
उदासी लटकी है
बसन्त
न जाने कहां खो गया है!
02. स्वयंवर
दर्द का स्वंयवर
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छायाचित्र : जितेंद्र कुमार |
हो रहा है
फिर कोई
गीत जन्म लेगा!
03. बचपन
चैनलों की भीड़ में
बचपन कहीं खो गया है
वक्त से पहिले
हर बच्चा
जवान हो गया है
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